कानपुर नगर निगम में अधिकारों की जंग: मेयर ने पलटे नगर आयुक्त के तीन फैसले, नगर आयुक्त बोले- शासन के निर्णय नहीं बदले जा सकते
मंगल भवन समितियों को लेकर कानपुर नगर निगम में मेयर प्रमिला पांडेय और नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय के बीच टकराव बढ़ा। जानिए तीनों फैसले और दोनों पक्षों की दलील।

मुख्य बातें:
कानपुर नगर निगम में महापौर प्रमिला पांडेय और नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय के बीच अधिकारों को लेकर टकराव तेज हो गया है।
शुक्रवार को कार्यकारिणी की बैठक में महापौर ने नगर आयुक्त के तीन फैसले पलट दिए।
नगर आयुक्त ने मंडलायुक्त के पत्र का हवाला देते हुए कहा कि ये तीनों फैसले शासन स्तर से हुए हैं, इसलिए इन्हें बदला नहीं जा सकता।
महापौर का कहना है कि सदन और कार्यकारिणी सर्वोच्च हैं और नियमों का पालन कराना उनका दायित्व है।
विवाद की शुरुआत मंगल भवन की दोनों समितियों को भंग करने के फैसले से हुई।
कानपुर नगर निगम के गलियारों में इन दिनों विकास कार्यों से ज्यादा चर्चा अधिकारों की लड़ाई की हो रही है। मंगल भवन की समितियां भंग करने के फैसले से शुरू हुआ विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार महापौर प्रमिला पांडेय ने शुक्रवार को हुई कार्यकारिणी की बैठक में नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय के तीन फैसलों को पलट दिया। इसके जवाब में नगर आयुक्त ने साफ कर दिया है कि ये फैसले शासन स्तर से लिए गए हैं और नगर निगम की कार्यकारिणी या सदन इन्हें नहीं बदल सकता।
कौन से हैं वो तीन फैसले?
रिपोर्टों के अनुसार जिन तीन फैसलों को लेकर विवाद है, वे इस प्रकार हैं:
1. मंगल भवन की समितियां भंग करना बेनाझाबर स्थित मंगल भवन के निर्माण और संचालन से जुड़ी दोनों समितियों को भंग कर उसका संचालन नगर निगम के संपत्ति विभाग को सौंपा गया था। नगर आयुक्त का कहना है कि यह फैसला मंडलायुक्त की ओर से शासन को भेजे गए संस्तुति पत्र के आधार पर लिया गया, जिसमें दोनों समितियों की गतिविधियों पर सवाल उठाए गए थे।
2. कन्वेंशन सेंटर का मामला नगर आयुक्त के अनुसार कन्वेंशन सेंटर में फिलहाल चयनित कंपनी ही काम करेगी। उनका कहना है कि यह प्रोजेक्ट नगर निगम से स्मार्ट सिटी को हैंडओवर हो चुका है और इसका फैसला स्मार्ट सिटी के बोर्ड ने लिया है।
3. 15 प्रतिशत से कम दर वाले टेंडर की व्यवस्था नगर आयुक्त ने बताया कि 15 प्रतिशत से नीचे की दर वाले टेंडर से जुड़ी व्यवस्था मई 2026 में पीडब्ल्यूडी के नए शासनादेश के तहत लागू की गई है। यानी यह फैसला भी शासन स्तर का है।
नगर आयुक्त की दलील
नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय का कहना है कि मंडलायुक्त का पत्र शासन के आदेश के बराबर है और शासन का फैसला नगर निगम स्तर पर पलटा नहीं जा सकता। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि नगर निगम सदन में केवल मंगल भवन के निर्माण और उसके लिए धनराशि का प्रस्ताव पास हुआ था। समिति बनाने का कोई प्रस्ताव सदन से पास नहीं हुआ था।
उनके अनुसार मंगल भवन की समितियां बहाल नहीं होंगी और उसका संचालन नगर निगम का संपत्ति विभाग ही करेगा। नगर आयुक्त ने यह भी कहा कि अगर नगर निगम सदन से कार्यकारिणी के फैसलों के पक्ष में कोई प्रस्ताव पास होता है, तो मामला शासन को भेजा जाएगा और नियमों के अनुसार कार्रवाई होगी।
महापौर का पक्ष
दूसरी ओर महापौर प्रमिला पांडेय का कहना है कि नगर निगम में सदन और कार्यकारिणी से बड़ा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा कि वह सदन की अध्यक्ष हैं और नियमों का पालन कराना उनकी जिम्मेदारी है। महापौर के अनुसार अगर इस तरह के फैसले लेने थे, तो उन्हें सदन में लाया जाना चाहिए था, ताकि वहां चर्चा के बाद निर्णय होता।
मंगल भवन विवाद की पृष्ठभूमि
मंगल भवन का मामला पिछले साल से चर्चा में है। सांसद रमेश अवस्थी ने इसके निर्माण में अनियमितताओं की शिकायत की थी। इसके बाद मंडलायुक्त स्तर की जांच में गड़बड़ियों और बाहरी लोगों की दखल की बात सामने आई थी। सितंबर 2026 में दोनों समितियों को भंग कर संचालन संपत्ति विभाग को सौंप दिया गया था।
इससे पहले दिसंबर 2025 में मंगल भवन के उद्घाटन के मौके पर सांसद और महापौर के बीच हुई तीखी बहस भी सुर्खियों में रही थी। इसी दौरान नगर निगम में टेंडर से जुड़ी गड़बड़ियों पर भी जांच चल रही है, जिसमें कई ठेकेदारों और कर्मचारियों पर कार्रवाई हो चुकी है।
नगर निगम में कौन क्या करता है?
इस विवाद को समझने के लिए नगर निगम की व्यवस्था जानना जरूरी है:
महापौर (मेयर): जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि होते हैं। वे नगर निगम सदन और कार्यकारिणी की बैठकों की अध्यक्षता करते हैं और नीतिगत दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
नगर आयुक्त: राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। नगर निगम का दैनिक प्रशासन, वित्तीय प्रबंधन और शासन के आदेशों का पालन कराना इनकी जिम्मेदारी होती है।
सदन: सभी चुने हुए पार्षदों की सभा, जहां बजट और बड़े प्रस्ताव पास होते हैं।
कार्यकारिणी: सदन की एक छोटी समिति, जो अहम प्रस्तावों पर विचार करती है।
शासन: यानी राज्य सरकार, जिसके आदेश और नियम नगर निगम पर लागू होते हैं।
आम तौर पर दोनों पक्षों की भूमिकाएं अलग होती हैं, लेकिन जब किसी फैसले के अधिकार क्षेत्र को लेकर मतभेद हो, तो अंतिम निर्णय के लिए मामला शासन तक जाता है।
शहर पर क्या असर पड़ेगा?
नगर निगम में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच तालमेल शहर के विकास के लिए बहुत जरूरी होता है। सड़कें, नालियां, सफाई, पार्क, स्ट्रीट लाइट और सामुदायिक भवन जैसे काम इसी व्यवस्था से चलते हैं। अगर लंबे समय तक टकराव बना रहे, तो इसका असर फाइलों की रफ्तार और प्रोजेक्ट्स पर पड़ सकता है।
मंगल भवन जैसे सामुदायिक भवन की बुकिंग, कन्वेंशन सेंटर का काम और टेंडर की प्रक्रिया, तीनों ही ऐसे मुद्दे हैं जिनका सीधा संबंध आम शहरवासियों से है। इसलिए लोगों की उम्मीद है कि यह विवाद जल्द सुलझे और विकास कार्य प्रभावित न हों।
आगे क्या हो सकता है?
अब यह मामला शासन के पाले में जाता दिख रहा है। अगर नगर निगम सदन में इन फैसलों को लेकर कोई प्रस्ताव पास होता है, तो नगर आयुक्त के अनुसार उसे शासन को भेजा जाएगा। ऐसे में अंतिम फैसला राज्य सरकार के स्तर पर ही होने की संभावना है। आने वाली सदन की बैठक पर सबकी नजर रहेगी।
kanpur.live की राय
लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने हुए प्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी, दोनों की अपनी-अपनी जिम्मेदारी है। मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन जरूरी है कि इनका समाधान नियमों और संवाद के जरिए हो। शहरवासियों के लिए सबसे अहम बात यह है कि उनकी सुविधाओं से जुड़े काम न रुकें। हम इस मामले के हर अपडेट पर नजर रखेंगे।
पार्षदों और शहरवासियों की नजर
इस विवाद पर नगर निगम के पार्षदों की भी नजर है। सदन में पार्षद अपने-अपने वार्डों की समस्याएं उठाते हैं और विकास कार्यों के प्रस्ताव पास कराते हैं। अगर महापौर और नगर आयुक्त के बीच तालमेल न रहे, तो वार्ड स्तर के कामों की मंजूरी और भुगतान में देरी हो सकती है। कई पार्षदों की चिंता यही है कि त्योहारों के मौसम में सफाई, सड़क मरम्मत और रोशनी जैसे जरूरी काम प्रभावित न हों।
शहरवासियों के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि मंगल भवन की बुकिंग किस व्यवस्था से होगी और उसकी दरें क्या होंगी। फिलहाल नगर आयुक्त के अनुसार संचालन संपत्ति विभाग के पास रहेगा। अगर आपने मंगल भवन की बुकिंग पहले से कराई है, तो अपनी रसीद संभालकर रखें और संपत्ति विभाग से बुकिंग की स्थिति की लिखित पुष्टि जरूर ले लें।
पहले भी हुए हैं ऐसे विवाद
देश के कई शहरों में चुने हुए महापौर और प्रशासनिक नगर आयुक्त के बीच अधिकारों को लेकर टकराव पहले भी देखने को मिले हैं। ऐसे मामलों में अक्सर नगर निगम अधिनियम और राज्य सरकार के नियम ही अंतिम आधार बनते हैं।
शहरवासी अपनी शिकायत कैसे दर्ज करें
नगर निगम से जुड़ी किसी भी समस्या, जैसे सफाई, सड़क, नाली या स्ट्रीट लाइट, की शिकायत नगर निगम के कॉल सेंटर, ऑनलाइन पोर्टल या जनसुनवाई पोर्टल पर की जा सकती है। शिकायत करते समय जगह और फोटो जरूर जोड़ें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न 1. कानपुर नगर निगम में विवाद किसके बीच है? महापौर प्रमिला पांडेय और नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय के बीच।
प्रश्न 2. महापौर ने कितने फैसले पलटे? रिपोर्टों के अनुसार शुक्रवार को कार्यकारिणी की बैठक में तीन फैसले।
प्रश्न 3. ये तीन फैसले कौन से हैं? मंगल भवन की समितियां भंग करना, कन्वेंशन सेंटर में चयनित कंपनी का काम और 15% से कम दर वाले टेंडर की व्यवस्था।
प्रश्न 4. नगर आयुक्त का क्या कहना है? उनके अनुसार ये फैसले शासन स्तर से हुए हैं, इसलिए कार्यकारिणी या सदन इन्हें नहीं बदल सकता।
प्रश्न 5. महापौर का क्या कहना है? उनके अनुसार सदन और कार्यकारिणी सर्वोच्च हैं और ऐसे फैसले सदन में लाए जाने चाहिए थे।
प्रश्न 6. मंगल भवन का संचालन अब कौन करेगा? नगर आयुक्त के अनुसार नगर निगम का संपत्ति विभाग।
प्रश्न 7. अंतिम फैसला कौन करेगा? मामला शासन, यानी राज्य सरकार के स्तर पर जा सकता है।
स्रोत: महापौर और नगर आयुक्त के बयानों पर आधारित स्थानीय रिपोर्ट, 11 अक्टूबर 2026।

